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विनायक व्रत कल्प

पूजा सामग्री

हल्दी, कुङ्कुम, चन्दन, अक्षत, पुष्प, फल, पान, सुपारी, नारियल, अगरबत्ती, दीपाराधन सामग्री, पञ्चामृत, मोदक, लड्डू, इक्कीस प्रकार के पत्र, दूर्वा, मिट्टी की गणेश प्रतिमा।


आचमन

ॐ केशवाय स्वाहा । ॐ नारायणाय स्वाहा । ॐ माधवाय स्वाहा ॥

गोविन्दाय नमः । विष्णवे नमः । मधुसूदनाय नमः । त्रिविक्रमाय नमः । वामनाय नमः । श्रीधराय नमः । हृषीकेशाय नमः । पद्मनाभाय नमः । दामोदराय नमः । सङ्कर्षणाय नमः । वासुदेवाय नमः । प्रद्युम्नाय नमः ॥


प्राणायाम

ॐ भूः । ॐ भुवः । ॐ सुवः । ॐ महः । ॐ जनः । ॐ तपः । ॐ सत्यम् । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम् ॥


सङ्कल्प

मम उपात्त दुरितक्षयद्वारा श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं शुभे शोभने मुहूर्ते, अद्य ब्रह्मणः द्वितीय परार्थे श्वेतवराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे कलियुगे प्रथम पादे जम्बूद्वीपे भरतवर्षे भरतखण्डे मेरोः दक्षिण दिग्भागे, अस्मिन् वर्तमान व्यावहारिक चान्द्रमानेन श्री ... नाम संवत्सरे दक्षिणायने वर्ष ऋतौ भाद्रपद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थ्यां तिथौ ... वासरे शुभ नक्षत्रे शुभ योगे शुभ करण एवंगुण विशेषण विशिष्टायां शुभ तिथौ मम क्षेम स्थैर्य धैर्य विजय आयुरारोग्य ऐश्वर्याभिवृद्ध्यर्थं, धर्मार्थ काम मोक्ष चतुर्विध फल पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थं, सिद्धि बुद्धि समेत श्री वरसिद्धि विनायक देवता मुद्दिश्य श्री वरसिद्धि विनायक देवता प्रीत्यर्थं कल्पोक्त प्रकारेण यावच्छक्ति ध्यानावाहनादि षोडशोपचार पूजां करिष्ये ॥


ध्यान

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

अगजानन पद्मार्कं गजाननमहर्निशम् ।
अनेकदं तं भक्तानां एकदन्तमुपास्महे ॥

ॐ श्री वरसिद्धि विनायक स्वामिने नमः । ध्यायामि ॥


षोडशोपचार पूजा

ॐ श्री वरसिद्धि विनायक स्वामिने नमः ।

आवाहयामि — आवाहनं समर्पयामि ।
नवरत्न खचित सिंहासनं समर्पयामि ।
पादयोः पाद्यं समर्पयामि ।
हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि ।
मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
मधुपर्कं समर्पयामि ।
पञ्चामृत स्नानं समर्पयामि ।
शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ।
वस्त्रयुग्मं समर्पयामि ।
यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
गन्धान् धारयामि ।
अक्षतान् समर्पयामि ।
पुष्पैः पूजयामि ॥


एकविंशति पत्र पूजा

ॐ सुमुखाय नमः — माचीपत्रं पूजयामि ।
ॐ गणाधिपाय नमः — बृहतीपत्रं पूजयामि ।
ॐ उमापुत्राय नमः — बिल्वपत्रं पूजयामि ।
ॐ गजाननाय नमः — दूर्वायुग्मं पूजयामि ।
ॐ हरसूनवे नमः — दत्तूरपत्रं पूजयामि ।
ॐ लम्बोदराय नमः — बदरीपत्रं पूजयामि ।
ॐ गुहाग्रजाय नमः — अपामार्गपत्रं पूजयामि ।
ॐ गजकर्णाय नमः — तुलसीपत्रं पूजयामि ।
ॐ एकदन्ताय नमः — चूतपत्रं पूजयामि ।
ॐ विकटाय नमः — करवीरपत्रं पूजयामि ।
ॐ भिन्नदन्ताय नमः — विष्णुक्रान्तपत्रं पूजयामि ।
ॐ वटवे नमः — दाडिमीपत्रं पूजयामि ।
ॐ सर्वेश्वराय नमः — देवदारुपत्रं पूजयामि ।
ॐ फालचन्द्राय नमः — मरुवकपत्रं पूजयामि ।
ॐ हेरम्बाय नमः — सिन्धुवारपत्रं पूजयामि ।
ॐ शूर्पकर्णाय नमः — जाजीपत्रं पूजयामि ।
ॐ सुराग्रजाय नमः — गण्डकीपत्रं पूजयामि ।
ॐ इभवक्त्राय नमः — शमीपत्रं पूजयामि ।
ॐ विनायकाय नमः — अश्वत्थपत्रं पूजयामि ।
ॐ सुरसेविताय नमः — अर्जुनपत्रं पूजयामि ।
ॐ कपिलाय नमः — अर्कपत्रं पूजयामि ॥


तदनन्तर श्री विनायक अष्टोत्तर शतनामावली से पूजा करनी चाहिए।


धूप दीप नैवेद्य

धूपमाघ्रापयामि ।
दीपं दर्शयामि ।
मोदक, लड्डू एवं फल नैवेद्यं समर्पयामि ।
ताम्बूलं समर्पयामि ।
नीराजनं समर्पयामि ।
मन्त्रपुष्पं समर्पयामि ।
आत्मप्रदक्षिण नमस्कारान् समर्पयामि ॥


व्रत कथा

पूर्वकाल में गजमुख गजासुर ने शिव की घोर तपस्या कर यह वर पाया कि शिव उसके उदर में ही निवास करें। शिव के गजासुर के उदर में रह जाने पर पार्वती वियोग सह न सकीं और विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने गङ्गिरेड्डु का वेष धरकर नन्दी को नचाया, गजासुर को प्रसन्न किया और शिव को मुक्त कराया।


शिव की प्रतीक्षा में पार्वती ने उबटन से एक बालक बनाकर उसमें प्राण डाले और द्वार पर पहरे पर बिठाया। भीतर न आने देने पर शिव ने उस बालक का शिर काट दिया। पार्वती के शोक करने पर गजासुर का शिर लाकर बालक को लगाया और जीवित किया। वही गजानन विनायक कहलाए और उन्हें विघ्नों का अधिपति — गणाधिपत्य — प्रदान किया गया।


भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को देवताओं ने विनायक की पूजा कर मोदक अर्पित किए। भरपेट भोजन कर विनायक मूषक वाहन पर घूम रहे थे कि एक सर्प को देखकर मूषक चौंका और विनायक गिर पड़े। उदर फटने से मोदक बिखर गए; विनायक ने उन्हें पुनः उदर में भरकर उसी सर्प को कमर में बाँध लिया। यह देखकर आकाश में चन्द्रमा हँस पड़ा।


क्रुद्ध विनायक ने चन्द्रमा को शाप दिया — "जो तुझे देखेगा, वह मिथ्या कलङ्क पाएगा।" इस शाप से लोक में क्लेश हुआ, तब देवताओं की प्रार्थना पर विनायक ने शाप शिथिल किया — "भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को ही चन्द्र दर्शन न करें; भूल से देख लेने पर जो यह व्रत कथा सुनकर शिर पर अक्षत धारण करेगा, वह कलङ्क से मुक्त होगा।"


आगे चलकर श्रीकृष्ण ने भूलवश उस दिन चन्द्रमा को देख लिया और स्यमन्तक मणि चुराने का मिथ्या कलङ्क पाया। जाम्बवान् से युद्ध कर मणि लाए और नारद के कहने पर विनायक व्रत करके उस कलङ्क से मुक्त हुए। इसी कारण यह व्रत करना, कथा सुनना और शिर पर अक्षत धारण करना परम्परा बन गई।


मङ्गल आरती

ॐ श्री वरसिद्धि विनायक स्वामिने नमः ।
कर्पूर नीराजनं समर्पयामि ॥

जय मङ्गलं नित्य शुभ मङ्गलम् ।
सिद्धि विनायक स्वामी को मङ्गलम् ॥


उद्वासन

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्ते यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥

श्री वरसिद्धि विनायक स्वामिने नमः । यथास्थानं उद्वासयामि ॥

अनया ध्यानावाहनादि षोडशोपचार पूजया भगवान् सर्वात्मकः श्री वरसिद्धि विनायक देवता सुप्रीत सुप्रसन्नो वरदो भवतु ॥